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रायपुर// छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहारों में शामिल झीरम घाटी हमले के 13 साल पुराने मामले में अदालत का फैसला आने के बाद अब विस्तृत रिकॉर्ड चर्चा के केंद्र में है। 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए माओवादी हमले में कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं समेत 27 लोगों की मौत हुई थी। सितंबर 2026 में NIA की विशेष अदालत ने मामले में 10 आरोपियों को दोषी ठहराने के बाद सभी को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
फैसले के बाद सामने आए रिकॉर्ड में हमले की तैयारी से जुड़े कई तथ्य दर्ज हैं। जांच के मुताबिक हमला अचानक लिया गया फैसला नहीं था। माओवादियों ने पहले इलाके की रेकी की, हमले की जगह तय की और ऑपरेशन से पहले इसकी तैयारी और रिहर्सल भी की थी।
रिपोर्टों के मुताबिक हमले की योजना कई सप्ताह पहले से बनाई जा रही थी। लेकिन अदालत के विस्तृत रिकॉर्ड का एक और हिस्सा अब सियासी बहस का कारण बन गया है। इसमें कवासी लखमा से संबंधित एक अभियोजन गवाह की गवाही का उल्लेख है।
गवाह ने क्या कहा, रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?
अदालती रिकॉर्ड में अभियोजन साक्षी क्रमांक 23 के बयान का उल्लेख किया गया है। गवाह के अनुसार, परिवर्तन यात्रा के दौरान कवासी लखमा नंदकुमार पटेल के वाहन में बैठे थे। रास्ते में उन्हें कई फोन आए और गवाह ने उनके गोंडी में बातचीत करने की बात कही। रिकॉर्ड में करीब 10-15 फोन कॉल का भी उल्लेख बताया गया है।
यही हिस्सा अब राजनीतिक बहस का केंद्र है। हालांकि, यहां एक अहम कानूनी फर्क समझना जरूरी है कि यह अभियोजन पक्ष के गवाह का बयान है। इसे अदालत का कवासी लखमा के खिलाफ साजिश में शामिल होने का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। हालिया अदालत के फैसले में जिन 10 आरोपियों को दोषी ठहराया गया और मृत्युदंड दिया गया, वह उन आरोपियों के खिलाफ चली न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम है।
गवाह की गवाही पर सियासत तेज
रिकॉर्ड सामने आने के बाद झीरम मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी फिर तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने NIA की जांच पर सवाल उठाते हुए कवासी लखमा से जुड़े बिंदु को लेकर सवाल किया है। उनका कहना है कि यदि जांच में संदेह या ऐसे तथ्य सामने आए थे, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने NIA की जांच की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं।
दूसरी ओर, सरकार की ओर से यह कहा गया है कि NIA ने मामले की विस्तृत जांच की, बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर चार्जशीट दाखिल हुई। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि जांच के दौरान सामने आए तथ्य चार्जशीट का हिस्सा हैं और उसी आधार पर अदालत में सुनवाई हुई।
अदालत में 101 गवाहों के बयान दर्ज
झीरम मामले की सुनवाई करीब 13 साल तक चली। इस दौरान अदालत में 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। NIA की विशेष अदालत ने 5 सितंबर 2026 को 10 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 16 सितंबर को सभी 10 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।
अदालत के फैसले के बाद भी मामले से जुड़े कुछ सवालों को लेकर पीड़ित परिवारों और राजनीतिक दलों की ओर से आगे जांच की मांग उठ रही है। खास तौर पर यह सवाल चर्चा में है कि हमले की व्यापक साजिश में शामिल अन्य लोगों की भूमिका को लेकर जांच किस निष्कर्ष तक पहुंची।
13 साल बाद फैसला, लेकिन बहस अभी बाकी
झीरम घाटी हमला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं थी। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं की जान गई थी। इसलिए इस मामले का राजनीतिक और सामाजिक असर आज भी बना हुआ है।
13 साल बाद अदालत ने 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है, लेकिन फैसले के विस्तृत रिकॉर्ड में दर्ज गवाहियों और जांच से जुड़े पहलुओं ने नई बहस को जन्म दिया है। खासकर कवासी लखमा से जुड़ा बयान अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बन गया है।
हालांकि, गवाह का बयान और अदालत का निष्कर्ष एक ही चीज नहीं हैं। इसलिए इस मामले में आगे की चर्चा करते समय यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत ने किन साक्ष्यों के आधार पर 10 आरोपियों को दोषी माना और जिन अन्य सवालों को लेकर राजनीतिक दावे किए जा रहे हैं, उनका न्यायिक रिकॉर्ड में क्या आधार है।
झीरम मामले में 13 साल बाद एक बड़ा न्यायिक पड़ाव जरूर आया है, लेकिन हमले की पूरी साजिश, सभी संबंधित भूमिकाओं और जांच से जुड़े बाकी सवालों को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है।



