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सारंगढ़ बिलाईगढ़// छत्तीसगढ़ के शासकीय विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान धार्मिक मंत्रों के पाठ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता बिनोद भारद्वाज ने आपत्ति जताते हुए इसे संविधान की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के विपरीत बताया है।
बिनोद भारद्वाज का कहना है कि सरकारी स्कूल शिक्षा का केंद्र हैं और यहां सभी धर्मों एवं समुदायों के बच्चे अध्ययन करते हैं। ऐसे में किसी एक धर्म विशेष से जुड़े मंत्रों या धार्मिक पाठ का आयोजन संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 राज्य द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा दिए जाने पर रोक लगाता है।
उन्होंने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक धर्म की स्वतंत्रता और राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। अनुच्छेद 28(1) के अनुसार राज्य निधि से संचालित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। ऐसे में विद्यालयों में धार्मिक मंत्रों का पाठ संवैधानिक बहस का विषय बनता है।
वहीं इस मुद्दे पर कुछ शिक्षाविदों और अभिभावकों की अलग राय है। उनका मानना है कि स्कूलों में होने वाली प्रार्थना, श्लोक या नैतिक संदेश बच्चों में अनुशासन, नैतिकता और अच्छे संस्कार विकसित करने का माध्यम हैं। उनके अनुसार इन्हें किसी धर्म विशेष के प्रचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा के हिस्से के रूप में समझा जाना चाहिए।
फिलहाल इस विषय पर शिक्षा विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राज्य के शासकीय विद्यालयों में प्रार्थना सभा की रूपरेखा विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुसार तय की जाती है। हालांकि बिनोद भारद्वाज के बयान के बाद शिक्षा में संस्कार और संविधान की धर्मनिरपेक्षता को लेकर बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है।



