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बिलासपुर// सर्पदंश से मौत के नाम पर करोड़ों रुपये के फर्जी मुआवजा घोटाले में अब बड़ा एक्शन होने जा रहा है। विधानसभा में मामला उठने और जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने 17 मामलों में एफआईआर दर्ज करने की तैयारी शुरू कर दी है। जांच के दायरे में कुछ डॉक्टर, वकील और मृतकों के परिजन भी शामिल हैं, जिनकी भूमिका की पड़ताल की जा रही है।
जांच में खुलासा हुआ है कि सर्पदंश से मौत दर्शाकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और शासन से मुआवजा राशि हासिल की गई। कई मामलों में अस्पताल में भर्ती होने के रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक संदिग्ध और फर्जी पाए गए। इन फर्जीवाड़ों के जरिए शासन को लगभग 60 लाख रुपये का नुकसान पहुंचाने की बात सामने आई है। जिला प्रशासन द्वारा किए गए परीक्षण में 17 ऐसे मामलों की पुष्टि हुई है, जिनमें नियमों को दरकिनार कर मुआवजा राशि प्राप्त की गई। अब संबंधित दस्तावेजों के आधार पर अपराध दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ और भी नाम सामने आ सकते हैं।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब सर्पदंश से मौत के आंकड़ों की तुलना में बड़ा अंतर सामने आया। जशपुर जिले में, जिसे नागलोक के नाम से जाना जाता है, सर्पदंश से 96 मौतें दर्ज हुईं और लगभग तीन करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किया गया। वहीं बिलासपुर जिले में 431 मौतें दर्ज कर 17 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बांट दी गई। इसी असामान्य अंतर ने पूरे मामले पर सवाल खड़े कर दिए।
विधानसभा में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने इस मुद्दे को उठाते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी। वहीं पूर्व नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा भुगतान की व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता बताई थी।वहीं एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा कि जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। वहीं कलेक्टर संजय अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से शासन को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन इस कथित फर्जीवाड़े के पूरे नेटवर्क तक पहुंच पाता है या नहीं। यह मामला केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि उन वास्तविक पीड़ित परिवारों के अधिकारों से भी जुड़ा है, जिनके लिए यह सहायता योजना बनाई गई थी।



