स्कूलों की बदहाली का हिसाब मांग रहा शासन, DEO साहब को फुर्सत नहीं, 32 जिलों के शिक्षा अधिकारियों को नोटिस..

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रायपुर// छत्तीसगढ़ में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रदेश में हजारों स्कूल भवन मरम्मत की बाट जोह रहे हैं, सैकड़ों स्कूलों के पास अपना भवन नहीं है और कई इमारतों को जर्जर या असुरक्षित बताया जा रहा है। ऐसे में लोक शिक्षण संचालनालय को जब स्कूलों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जिलों से जानकारी मांगनी पड़ी, तो तय समयसीमा में पूरी रिपोर्ट भेजने वाले जिलों की संख्या महज एक रही।

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लिहाजा बलौदाबाजार को छोड़कर बाकी सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करती है।

गौरतलब है कि लोक शिक्षण संचालनालय ने 7 सितंबर को सभी जिला शिक्षा अधिकारियों से भवनविहीन और मरम्मत योग्य स्कूलों की जानकारी एक सप्ताह के भीतर मांगी थी। उद्देश्य स्पष्ट था कितने स्कूलों को मरम्मत की जरूरत है, कहां भवन जर्जर हैं और किन स्थानों पर नए भवन बनाने की आवश्यकता है, इसका आकलन किया जा सके। लेकिन निर्धारित समयसीमा बीतने के बाद भी 33 में से 32 जिलों ने पूरी जानकारी नहीं भेजी। बलरामपुर जिले से केवल भवनविहीन स्कूलों का विवरण मिला, जबकि मरम्मत योग्य स्कूलों की जानकारी लंबित रही।

इसके बाद संचालनालय ने संबंधित अधिकारियों को तीन दिन के भीतर जवाब देने और जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और अक्टूबर का वेतन रोकने की चेतावनी भी दी गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं है कि जब स्कूलों के भवनों की स्थिति जैसी बुनियादी जानकारी जुटाने के लिए बार-बार निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो जिलों में शिक्षा व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हो रही होगी ?

8 हजार से ज्यादा स्कूलों को मरम्मत की जरूरत

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में करीब 47 हजार सरकारी स्कूल हैं। इनमें 8,106 स्कूल भवनों को आंशिक या व्यापक मरम्मत की जरूरत बताई गई है। करीब 3,500 भवन अत्यधिक जर्जर या असुरक्षित बताए गए हैं। एक हजार से अधिक भवनों को तोड़कर नए निर्माण की आवश्यकता बताई गई है, जबकि लगभग 200 से 250 स्कूल भवनविहीन हैं।

यदि ये आंकड़े मौजूदा स्थिति को दर्शाते हैं, तो समस्या का पैमाना छोटा नहीं है। इन परिस्थितियों में जिला शिक्षा अधिकारियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। स्कूल भवनों की स्थिति का नियमित आकलन करना, जोखिम वाले भवनों की पहचान करना और समय पर रिपोर्ट भेजना प्रशासनिक औपचारिकता भर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़ा आवश्यक काम है।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब स्कूलों की जरूरतों का आकलन करने के लिए जानकारी मांगी गई, तो अधिकांश जिलों से पूरी रिपोर्ट समय पर क्यों नहीं मिली ?

क्या कागजों पर चल रही है स्कूलों की निगरानी ?

जिला शिक्षा अधिकारियों के पास अपने-अपने जिलों के स्कूलों की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में भवनविहीन और मरम्मत योग्य स्कूलों की अद्यतन जानकारी उपलब्ध होना जरूरी है। यदि इस जानकारी को संकलित करने और राज्य मुख्यालय तक पहुंचाने में ही देरी होती है, तो यह प्रशासनिक समन्वय और निगरानी की व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को सामने लाता है।

हालांकि रिपोर्ट में देरी के पीछे प्रत्येक जिले की अलग-अलग परिस्थितियों की जांच किए बिना इसे सभी अधिकारियों की व्यक्तिगत लापरवाही का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।लेकिन 32 जिलों से पूरी जानकारी समय पर नहीं मिलना ऐसी स्थिति जरूर है, जिस पर स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए।

नोटिस से आगे बढ़ेगी कार्रवाई या मामला जवाब-तलब तक सीमित रहेगा ?

लोक शिक्षण संचालनालय ने संबंधित जिला शिक्षा अधिकारियों को तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने और लंबित जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। जवाब असंतोषजनक होने पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम, 1966 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अधिकारी समय पर जवाब देते हैं या नहीं, रिपोर्ट में कितने स्कूलों की वास्तविक स्थिति सामने आती है और मरम्मत तथा नए भवनों के निर्माण के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। साथ ही, शासन और शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया केवल कागजी खानापूर्ति बनकर न रह जाए।

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