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सारंगढ़-बिलाईगढ़// भारत के प्रमुख त्योहारों में शामिल रक्षाबंधन का पर्व जिलेभर में हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी और भाइयों ने हमेशा अपनी बहनों की रक्षा करने का वादा किया। बड़े-बुजुर्गों के साथ बच्चों में भी रक्षाबंधन को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। सारंगढ़-बिलाईगढ़ सहित पूरे प्रदेश में लोगों ने प्रेम और भाईचारे के साथ इस पावन पर्व को मनाया।

रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। राखी का धागा भले ही छोटा हो, लेकिन इसमें भाई-बहन के बीच वर्षों से जुड़ा स्नेह और भावनाएं समाई होती हैं। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी खुशहाली की कामना करती हैं, वहीं भाई भी बहनों के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहने और उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। यही भाव इस त्योहार को खास बनाता है।

रक्षाबंधन की यह है मान्यता
लक्ष्मीजी ने बांधी थी राजा बलि को राखी – राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश की थी। बलि की तपस्या से घबराए देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णुजी वामन ब्राह्मण का रूप रखकर राजा बलि से भिक्षा अर्चन के लिए पहुंचे। गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि अपने संकल्प को नहीं छोड़ा और तीन पग भूमि दान कर दी।

वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। बलि भक्ति के बल पर विष्णुजी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। इससे लक्ष्मीजी चिंतित हो गईं। नारद के कहने पर लक्ष्मीजी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बनाया और संकल्प में बलि से विष्णुजी को अपने साथ ले आईं। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरू हुआ, जो आज भी अनवरत जारी है।
द्रौपदी ने बांधी थी भगवान कृष्ण को राखी – राखी का एक कथानक महाभारत काल से भी प्रसिद्ध है। भगवान श्रीकृष्ण ने रक्षा सूत्र के विषय में युधिष्ठिर से कहा था कि रक्षाबंधन का त्योहार अपनी सेना के साथ मनाओ, इससे पांडवों एवं उनकी सेना की रक्षा होगी। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा था कि रक्षा सूत्र में अद्भुत शक्ति होती है।
खून रोकने के लिए बांधा साड़ी का कपड़ा – शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण की तर्जनी में चोट आ गई, तो द्रौपदी ने लहू रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दी थी। यह भी श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। भगवान ने चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर यह कर्ज चुकाया था। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरू हुआ।



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