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रायपुर// छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पिछले 11 वर्षों से पढ़ा रहे हजारों अतिथि शिक्षक (विद्या मितान) आज अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जिन शिक्षकों ने दूरस्थ, वनांचल और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठाई, वे अब नियमितीकरण, सम्मानजनक वेतन और सेवा सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। विद्या मितानों का कहना है कि जब दुर्गम इलाकों में नियमित शिक्षक जाने से बचते थे, तब उन्होंने कठिन परिस्थितियों में स्कूलों तक पहुंचकर बच्चों को शिक्षा दी। वर्षों तक सेवा देने के बावजूद आज भी उन्हें स्थायी नौकरी नहीं मिल सकी है।
एक ही स्कूल में काम, लेकिन वेतन में बड़ा अंतर
आंदोलनरत शिक्षकों का कहना है कि एक ही स्कूल में समान शैक्षणिक योग्यता और समान कार्य करने के बावजूद उन्हें नियमित और संविदा शिक्षकों की तुलना में काफी कम मानदेय मिलता है। जहां अन्य शिक्षकों को 38 हजार से 80 हजार रुपये तक वेतन मिलता है, वहीं विद्या मितानों को केवल 20 हजार रुपये मानदेय दिया जाता है। इतना ही नहीं, यह भुगतान भी साल के केवल 10 महीनों के लिए होता है। शिक्षकों का कहना है कि दो महीने बिना आय के गुजरते हैं, जबकि परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दैनिक जरूरतें लगातार बनी रहती हैं।
दुर्गम क्षेत्रों में जोखिम के बीच निभाई जिम्मेदारी
विद्या मितानों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक दूर-दराज के गांवों में पढ़ाने के लिए लंबी दूरी तय की। कई बार खराब सड़कें, उफनते नदी-नाले और नक्सल प्रभावित इलाके भी उनके कर्तव्य का हिस्सा रहे। उनका दावा है कि ड्यूटी के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में चार शिक्षकों की मौत हो चुकी है और कई शिक्षक घायल होकर स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए, लेकिन प्रभावित परिवारों को पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकी।
सरकार से क्या हैं प्रमुख मांगें
आंदोलन कर रहे शिक्षकों ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से नियमितीकरण या संविलियन, पूरे 12 महीने का मानदेय, सेवा सुरक्षा, ग्रीष्मकालीन अवकाश का भुगतान, आकस्मिक अवकाश तथा महिला शिक्षकों के लिए मातृत्व अवकाश की सुविधा शामिल है। शिक्षकों का कहना है कि वे किसी प्रकार की विशेष रियायत नहीं मांग रहे, बल्कि वर्षों की सेवा के आधार पर न्याय और सम्मान चाहते हैं।
अनिश्चितकालीन आंदोलन जारी
विद्या मितानों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका “काम बंद, कलम बंद” आंदोलन जारी रहेगा। उनका कहना है कि उन्होंने प्रदेश के हजारों बच्चों का भविष्य संवारने में अपना योगदान दिया है, इसलिए अब सरकार को भी उनके भविष्य की चिंता करनी चाहिए। अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या फैसला लेती है और लंबे समय से सेवा दे रहे इन शिक्षकों को राहत मिलती है या उनका संघर्ष आगे भी जारी रहता है।


