झीरम के 10 दोषियों की सजा से पूरा न्याय नहीं, असली साजिशकर्ताओं तक पहुंचना बाकी: ताराचंद देवांगन और सूरज तिवारी..

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सारंगढ़-बिलाईगढ़// 25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी नरसंहार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं समेत 29 लोगों की हत्या के मामले में NIA कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। फैसले को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ताराचंद देवांगन और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सूरज तिवारी ने प्रेस वार्ता कर इसे “आधा-अधूरा न्याय” बताया। दोनों नेताओं ने कहा कि वे न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन घटना के पीछे कथित बड़े राजनीतिक षडयंत्र और मुख्य साजिशकर्ताओं तक जांच नहीं पहुंचने से कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।

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ताराचंद देवांगन ने कहा कि अदालत ने वही फैसला दिया है, जो तथ्य NIA ने उसके सामने प्रस्तुत किए। उनके अनुसार, सवाल न्यायालय के फैसले पर नहीं बल्कि जांच की दिशा पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि NIA की जांच शुरुआत से ही सही दिशा में आगे नहीं बढ़ी और झीरम हमले के कथित राजनीतिक षडयंत्र के पहलू की पर्याप्त जांच नहीं की गई।

उन्होंने कहा कि NIA द्वारा गिरफ्तार किए गए 10 आरोपियों को दोषी ठहराया गया है, लेकिन इतनी बड़ी घटना केवल निचले स्तर के नक्सलियों के भरोसे संभव नहीं थी। देवांगन ने सवाल उठाया कि जिन बड़े नक्सली नेताओं के नाम प्रारंभिक FIR में शामिल थे, बाद में चार्जशीट से उनके नाम क्यों हटा दिए गए। उनके मुताबिक, यही सवाल झीरम के कथित वास्तविक षडयंत्र की तह तक पहुंचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।

सुरक्षा और यात्रा का मार्ग बदलने पर सवाल

ताराचंद देवांगन ने सवाल उठाया कि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा आखिर क्यों हटाई गई थी? यात्रा का मार्ग किसके कहने पर और किन परिस्थितियों में बदला गया? हमले की योजना किसने बनाई? उन्होंने कहा कि समय-समय पर कई बड़े नक्सली नेताओं ने आत्मसमर्पण किया और उनके झीरम हमले से जुड़े होने के दावे भी सामने आए, ऐसे में NIA ने उनसे पूछताछ क्यों नहीं की, यह स्पष्ट होना चाहिए।

उन्होंने झीरम हमले में घायल और जीवित बचे लोगों के बयानों को लेकर भी सवाल उठाए। देवांगन का कहना है कि कई प्रभावित लोग शपथपत्र के साथ जांच एजेंसियों के समक्ष पहुंचे थे, लेकिन उनके बयानों को जांच का हिस्सा नहीं बनाया गया। उन्होंने घटनास्थल से मिले महत्वपूर्ण दस्तावेज, फाइल, पर्स और मोबाइल फोन की जांच एवं जब्ती को लेकर भी सवाल उठाया।

बड़े नक्सली नेताओं के नाम हटाने पर सवाल

देवांगन ने कहा कि प्रारंभिक जांच में गणपति उर्फ मुप्पला लक्ष्मण राव और रमन्ना सहित कई प्रमुख नक्सली नेताओं के नाम सामने आए थे। उन्होंने 21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना समेत 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि बाद की चार्जशीट में इन नामों को क्यों हटा दिया गया। उनके मुताबिक, अगस्त 2014 तक ये नाम मौजूद थे, लेकिन सितंबर 2014 में अदालत के समक्ष प्रस्तुत प्रारंभिक एवं अंतिम चार्जशीट में इनका उल्लेख नहीं रहा। उन्होंने कहा कि इन नामों को हटाने के पीछे क्या कारण था, यह सार्वजनिक होना चाहिए।

देवांगन ने देवा बार से जुड़े सुक्का उर्फ देवा सहित अन्य वांछित नक्सलियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल किया कि जिन लोगों को कभी झीरम मामले में वांछित बताया गया और बाद में उनमें से कई ने आत्मसमर्पण किया, उनसे NIA ने पूछताछ क्यों नहीं की। उन्होंने चैतू उर्फ श्याम दादा, रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरड्डी, निर्मला उर्फ सुमित्रा, भूपति उर्फ सोनू दादा और सुजाता जैसे आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली नेताओं का भी उल्लेख किया।

देवांगन ने कहा कि यदि ये लोग संगठन में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं और झीरम हमले से जुड़ी उनकी भूमिका को लेकर दावे सामने आए हैं, तो उनकी पूछताछ और भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई। उन्होंने झीरम मामले के सभी प्रमुख पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग की।

तत्कालीन अधिकारियों से पूछताछ को लेकर भी सवाल

ताराचंद देवांगन ने तत्कालीन सरकार के शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, मुख्य सचिव, डीजीपी और नक्सल मामलों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों से NIA ने कब और कितनी पूछताछ की।

उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था से लेकर हमले की परिस्थितियों तक कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब सामने आना जरूरी है। कांग्रेस नेता के अनुसार, जब तक इन पहलुओं की जांच नहीं होगी, तब तक झीरम की पूरी सच्चाई सामने आने की बात अधूरी रहेगी।

सूरज तिवारी बोले- झीरम लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला था

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सूरज तिवारी ने भी NIA कोर्ट के फैसले को “आधा-अधूरा न्याय” बताते हुए कहा कि झीरम केवल एक नक्सली हमला नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हुआ गंभीर हमला था। उन्होंने कहा कि दोषियों को सजा मिलना जरूरी है, लेकिन जब तक घटना की पूरी साजिश और उसके पीछे मौजूद लोगों की भूमिका सामने नहीं आती, तब तक पीड़ित परिवारों और प्रदेश की जनता के मन में उठ रहे सवालों का समाधान नहीं होगा।

सूरज तिवारी और ताराचंद देवांगन ने भाजपा की तत्कालीन सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि झीरम मामले की जांच को रोकने और उसकी दिशा प्रभावित करने के प्रयास हुए। उन्होंने न्यायिक जांच आयोग और छत्तीसगढ़ पुलिस की SIT को लेकर हुए घटनाक्रम का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इन पहलुओं पर भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

कांग्रेस बोली- झीरम का सच फैसले तक सीमित नहीं

कांग्रेस नेताओं ने कहा कि झीरम का सच केवल अदालत के फैसले तक सीमित नहीं होना चाहिए। घटना में मारे गए कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं, सुरक्षा जवानों और अन्य लोगों के परिवारों को पूर्ण न्याय तभी मिलेगा, जब हमले की पूरी साजिश, आदेश देने वालों और इसके पीछे की वास्तविक कड़ियों का पता चले।

उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए कांग्रेस झीरम मामले से जुड़े अनुत्तरित सवालों को उठाती रहेगी और कथित राजनीतिक षडयंत्र की निष्पक्ष जांच की मांग जारी रखेगी। प्रेस वार्ता में विनोद भारद्वाज, राधेश्याम जायसवाल, लता जाटवर, रामनाथ सिदार, मोहम्मद अकबर सहित सारंगढ़ और बिलाईगढ़ विधानसभा क्षेत्रों के कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में मौजूद रहे।

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