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सारंगढ़–बिलाईगढ़// जिले के किसानों को आखिरकार बड़ी राहत मिली है। लगातार आंदोलन और प्रदर्शन के बाद देर शाम एसडीएम वर्षा बंसल ने आदेश जारी करते हुए सभी सहकारी समितियों को वास्तविक किसानों का टोकन काटने के निर्देश दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि भौतिक सत्यापन के बाद किसी भी किसान को टोकन से वंचित नहीं किया जाएगा।

बता दें कि पिछले कई दिनों से जिले के किसान टोकन कटवाने के लिए सहकारी समितियों के चक्कर काट रहे थे। भौतिक सत्यापन हो जाने के बावजूद किसानों को एसडीएम से अनुमति लेकर आने को कहा जा रहा था, जिससे उनकी परेशानी लगातार बढ़ती जा रही थी। अलग-अलग समितियों में यही स्थिति बनी हुई थी। शुक्रवार को यह नाराजगी खुलकर सामने आ गई। जब अनुमति लेने पहुंचे किसानों को एसडीएम कार्यालय में काफी देर तक इंतजार करना पड़ा। जब उनकी सुनवाई नहीं हुई तो सैकड़ों की संख्या में किसान, जिनमें बुजुर्ग और महिलाएं भी शामिल थीं, कार्यालय के बाहर नारेबाजी करते हुए धरने पर बैठ गए। कुछ ही देर में कांग्रेस कार्यकर्ता भी किसानों के समर्थन में पहुंच गए और टोकन काटने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन शुरू हो गया।

स्थिति बिगड़ती देख प्रशासन हरकत में आया। प्रदर्शनकारियों को समझाइश दी गई और देर शाम एसडीएम द्वारा टोकन काटने संबंधी आदेश जारी किया गया। आदेश जारी होते ही आंदोलन समाप्त हुआ और किसानों ने राहत की सांस ली। मगर इतना ही नहीं इससे पहले गुरुवार को कपरतुंगा समिति में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली थी। जहां टोकन नहीं कटने से परेशान किसानों के समर्थन में स्वयं विधायक उत्तरी गनपत जांगड़े को धरने पर बैठना पड़ा था। तब तहसीलदार की समझाइश के बाद मामला शांत हुआ था।
गौरतलब है कि खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के तहत धान खरीदी का कार्य प्रदेशभर में जारी है और अब इसमें केवल एक सप्ताह का समय ही बचा है। ऐसे में टोकन को लेकर किसानों को जिस तरह की परेशानी और आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा, वैसी स्थिति पहले कभी देखने को नहीं मिली थी।
फिलहाल इस आदेश के बाद किसानों को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन यह राहत स्थायी साबित होगी या नहीं, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। हकीकत यह है कि धान खरीदी के अंतिम सप्ताह में आकर किसानों को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ा, जो सीधे तौर पर प्रशासनिक नाकामी और सरकार की अव्यवस्थित नीति को दिखाता है। अगर समय रहते स्पष्ट आदेश और सुचारू व्यवस्था होती, तो अन्नदाताओं को सड़कों पर बैठकर नारेबाजी नहीं करनी पड़ती। सरकार जीरो टॉलरेंस और किसान हित की बातें जरूर करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात इसके ठीक उलट नजर आ रहे हैं। जिस अन्नदाता के दम पर प्रदेश और देश का पेट भरता है, वही अगर अपमानित और परेशान होकर धरने पर बैठे, तो यह व्यवस्था पर सीधा सवाल है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है या वास्तव में किसानों को बिना भटकाए, बिना बहाने, सम्मान के साथ उनका हक मिलता है। अगर अंतिम दिनों में भी किसानों को टोकन और धान बिक्री के लिए संघर्ष करना पड़ा, तो यह साफ होगा कि सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है।



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