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बिलासपुर/ आज यानी बुधवार को गणेशोत्सव है। भगवान गणपति घर से लेकर पंडाल तक में विराजेंगे। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गणेशोत्सव मनाने की परंपरा साल 1920 में शुरू हुई। इसी साल समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक का निधन हुआ था। उनकी प्रेरणा से स्थानीय महाराष्ट्रीयन परिवार ने तिलक नगर स्थित श्रीराम मंदिर में पहली बार गणेश प्रतिमा स्थापित की। इसके बाद धीरे-धीरे पूरे शहर में गणपति बप्पा विराजित होने लगे। अब गणेशोत्सव परिवार, समाज से निकलकर हर वर्ग तक पहुंच गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी देवताओं में प्रथम पूज्यनीय भगवान गणेश हैं। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। यही वजह है कि वैदिक पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाते हैं। घर-घर में गणेशजी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करते हैं। इस साल यह त्योहार 31 अगस्त को मनाया जा रहा है।
102 साल पहले हुई थी सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत
महाराष्ट्र मंडल के सचिव रह चुके व वरिष्ठ नागरिक शैलेंद्र गोवर्धन बताते हैं कि बिलासपुर में सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव मनाने की परंपरा 102 साल पुरानी है। गणेश चतुर्थी पर्व पर पहले लोग अपने घरों में ही भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना करते रहे हैं। तब तिलक नगर चांटापारा की पहचान महाराष्ट्रीयन परिवार के रूप में थी। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग महाराष्ट्रीयन थे।
साल 1900 में सार्वजनिक रूप से पूजा-अर्चना करने के लिए श्रीराम मंदिर बनाने का काम शुरू हुआ। मंदिर बनने में पांच साल लग गए। मंदिर निर्माण होने के बाद 1905 में भगवान राम, सीता, लक्ष्मण के साथ ही परिसर में भगवान शंकर की प्रतिमा स्थापित की गई। तब शुरूआत में धार्मिक पर्व और त्योहारों में सभी वर्ग के लोग यहां पूजा-अर्चना करने आते थे। इसके बाद 1920 में इसी मंदिर परिसर में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेश प्रतिमा स्थापित कर गणेशोत्सव मनाया गया।
बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य की स्थापना से मिली प्रेरणा
समाज सेवी और साहित्यकार विद्या गोवर्धन बताती हैं कि सभी हिंदू धर्म के लोगों के साथ ही महाराष्ट्रीयन परिवार के लोग गणेशजी को प्रथम पूज्यनीय मानते हैं। महाराष्ट्र में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से गणेशोत्सव पर्व मनाया जाता है। उन्होंने समाज के हर वर्ग तक अपनी बात पहुंचाने और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए गणेशोत्सव पर्व मनाने की परंपरा शुरू की थी।
साल 1920 में जब शहर के श्रीराम मंदिर में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव पर्व मनाया जाने लगा, तब वहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यहां एकत्रित होते थे। वे समाज के सभी वर्ग के लोगों को आजादी की लड़ाई में एकजुट होने की अपील भी करते थे। उन्होंने बताया कि 1975 में मेरी शादी हुई, तब से हम लोग यहां गणेशोत्सव पर्व मनाते आ रहे हैं।
अब हर गली-मोहल्ले और चौक-चौराहों में है गणेशोत्सव की धूम
श्रीराम मंदिर से सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाने की परंपरा यह परंपरा अब धार्मिक उत्सव का रूप ले चुका है। तब आजादी के दीवानों ने इस उत्सव को समाज को एकसूत्र में पिरोने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई के लिए हथियार बनाया था। वहीं, अब गणेशोत्सव धार्मिक आस्था का रूप ले चुका है। शहर के हर गली-मोहल्लों के साथ ही गांव-गांव में सार्वजनिक रूप से भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना कर उत्साह और उमंग के साथ इसे पर्व के रूप में मनाने लगे हैं।
सार्वजनिक मंच तैयार करने गणेशोत्सव मनाने की शुरू हुई थी परंपरा
महाराष्ट्र के युवा क्रांतिकारी नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज्य के संघर्ष के लिए अपने विचारों को हर व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते थे। लेकिन, इसके लिए उन्हें एक सार्वजनिक मंच की जरूरत थी। तब तिलक ने गणपति उत्सव के अवसर पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात लोगों तक पहुंचाई। तब से ही गणेशोत्सव को धूमधाम से मनाया जाने लगा। यानी गणेशोत्सव तभी से राष्ट्रीय एकता का पर्व बन गया और देश भर में इसे उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।




