मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूर्व विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव के निधन पर जताया शोक, पढ़िए उनका राजनैतिक सफरनामा..

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रायपुर// जशपुर की राजनीति को अपने इशारों पर नचाने वाले, एक समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज से युक्त नेता, छत्तीसगढ़िया और जशपुरिया स्वाभिमान के लिए किसी की परवाह न करने वाले युद्धवीर सिंह जूदेव का असमय चले जाना जशपुर और छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक खालीपन दे गया है जिसे शायद ही कोई भर सके।

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूर्व विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। उन्होंने ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति और परिजनों को दुःख की घड़ी को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है।

बता दें कि पिछले कुछ महीनों से युद्धवीर सिंह जूदेव लीवर के गंभीर संक्रमण से जूझ रहे थे। हालत बिगड़ने पर पहले उन्हें दिल्ली के इंस्टिट्यूट ऑफ़ लीवर एंड बिलिअरी साइंसेस में भर्ती किया गया था, जहां एक पखवाड़े से ज्यादा समय तक उनका इलाज किया गया, लेकिन स्थिति में कुछ सुधार नहीं होने के बाद उन्हें बेंगलुरू के एस्टर हॉस्पिटल ले जाया गया था। जहां डॉक्टरों के अथक प्रयास के बाद भी वे सोमवार की सुबह 4 बजे इस दुनिया को अलविदा कह गए।

पूर्व विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव का निधन न केवल भाजपा बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति के लिए अपूर्णीय क्षति है। काफी कम उम्र में सियासत के पायदान पर कदम रखने वाले युद्धवीर को काफी तजुर्बेकार राजनीतिज्ञ माना जाता रहा है।

आइए जानते हैं उनका राजनीतिक सफरनामा..

युद्धवीर सिंह जूदेव का वो राजनीतिक जीवन जिसे सामाजिक जीवन कह लें ज्यादा सही होगा। क्योंकि युद्धवीर कभी राजनीति करते नजर नही आये, बल्कि सामाजिक जीवन ही जीते नजर आए, क्योंकि उनका सदैव यही मानना था कि समाज और समाज के लिए करना ही उनका राजनीतिक जीवन की परिभाषा रही। अगर उनके सामाजिक राजनीतिक जीवन की बात की जाए तो बहुत कम उम्र में ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हो गयी थी।

सबसे पहले सन 2000 के आसपास बजरंग दल के जिला अध्यक्ष रहे। उसके बाद 2004 में सबसे कम उम्र में जिला पंचायत जशपुर के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उसी समय प्रदेश में उन्होने भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दायित्व सम्हाला। 2008 में चंद्रपुर के लिए विधायक के रूप में निर्वाचित हुए, उसी कार्यकाल में सांसदीय सचिव के रूप में कार्य किया। दूसरी बार चन्दरपुर से विधायक चुने गए, ये दूसरी बार विधायक से पहले उनके बड़े भाई शत्रुंजय सिंह जूदेव और पिता दिलीप सिंह जूदेव की आकस्मिक मौत के तुरंत बाद इस चुनाव का सामना करना पड़ा था। तीसरी बार उन्होंने खुद चुनाव न लड़ते हुए अपनी पत्नी को चुनाव चंद्रपुर से लड़ाया, पर वहां हार हुई।

मगर सामाजिक जीवन उनका चलता रहा, उन्होंने कभी गलत को गलत कहने से हिचक नही की। ये वही अंदाज था जो अपने पिता से विरासत में मिली थी। जिसके कायल पार्टी के साथ विपक्षि भी थे। यही कारण था वो जिधर भी चले अपने साथ कारवां बनाते चले। जशपुर में ये हालत तो ये थी कि जिस ओर भी ओ घूमने के बहाने भी निकलते उधर की फिजा ही युद्धवीर की रंग में रंग जाता था। जहां विपक्षियो के हर राजनीतिक दांव धरे के धरे रह जाते थे।

उनकी एक ऐसी टीम गांव गांव में थी जो राजनीति के मुख्य चेहरे में तो गायब रहती थी, पर जैसे ही इशारा मिलता एक्टिव होती थी और रंग को अपने मे समाहित कर लेती थी। सबसे बड़ी बात जशपुर का कोरवा समाज जो दिलीप सिंह जूदेव के साथ कदमताल करता था, उनके जाने के बाद युद्धवीर के साथ कोरवा के यहां का जनजातीय समाज एक संदेश पर साथ मे कदमताल करता नजर आता था।

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