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बीजापुर//छत्तीसगढ़ के बीजापुर-सुकमा जिले की सरहद पर स्थित सिलगेर में स्थापित किए गए पुलिस कैंप के विरोध में ग्रामीण एक बार फिर लामबंध हुए हैं। सैकड़ों ग्रामीण शुक्रवार को तीर-धनुष, कुल्हाड़ी जैसे पारंपरिक हथियार लेकर पुलिस कैंप के सामने अचानक पहुंच गए थे। यहां कैंप हटाने की मांग को लेकर जमकर नारेबाजी भी की गई। सैकड़ों ग्रामीणों को कैंप के सामने से हटने और लौटने की समझाइश देने के लिए कैंप के जवानों को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। हालांकि कुछ देर बाद ग्रामीण अपने डेरा लेकर लौट गए।
ग्रामीणों ने कहा कि, जब तक पुलिस कैंप नहीं हटाया जाएगा वे आंदोलन में डटे रहेंगे। गांव में सड़क निर्माण का काम भी चल रहा है उसे भी बंद किया जाए। ग्रामीणों ने मांग की है कि सिलगेर में पुलिस की गोलियों से मारे गए ग्रामीणों के परिजनों को एक-एक करोड़ और घायलों को 50-50 लाख रुपए का सरकार मुआवजा दे। वहीं बस्तर के अंदरूनी इलाकों में में जितने भी पुलिस कैंप खोले जा रहे हैं उन्हें न खोलें। साथ ही जहां-जहां कैंप खोलने का प्रस्ताव रखा गया है उन्हें भी निरस्त किया जाए।
कैंप से आधा किमी की दूरी पर है ग्रामीणों का डेरा, 9 महीने से विरोध जारी
सिलगेर में स्थापित पुलिस कैंप से महज आधा किमी की दूरी पर ही ग्रामीणों का डेरा है। मई माह से पुलिस कैंप के विरोध में ग्रामीण बैठे हुए हैं। ग्रामीणों को डेरा जमाए लगभग 9 महीने पूरे हो गए हैं। हालांकि दूसरी लहर में ग्रामीणों की भीड़ थोड़ी कम जरूर हुई थी। लेकिन, अब फिर एकाएक ग्रामीण जमा होने शुरू हो गए हैं। यहां ग्रामीण तंबू गाड़ कर बैठे हुए हैं। गर्मी, बरसात और ठंड इन तीनों मौसम में भी ग्रामीण यहां से उठे तक नहीं।
यह था सिलगेर का मामला
दरअसल, मई 2021 में नक्सल प्रभावित इलाके सिलगेर में नवीन पुलिस कैंप खोला गया था। यहां कैंप खुलने के दूसरे दिन ही इलाके के हजारों ग्रामीण आंदोलन में बैठ गए थे। इस बीच सुरक्षाबलों के साथ ग्रामीणों की झड़प हुई थी। ऐसे में जवानों ने फायरिंग भी खोल दी थी। जिससे गोली लगने से 3 लोगों की और भगदड़ में एक महिला की जान गई थी। पुलिस का कहना था कि, इस भीड़ में नक्सली भी मौजेद थे, जबकि ग्रामीणों ने मारे गए लोगों को निर्दोष आदिवासी बताया था।



